Thursday, 31 March 2016

Guru Gyan 11

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Guru Gyan 10

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Guru Gyan 9

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Guru Gyan 8

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मन को हम ही अविराम दौड़ते हैं ,जिस दिन हमने चाबी भरना बंदकिया , तब ही अस्तित्व के आंगन मे दृष्टा भाव का सूर्योदय हो जाएगा ।


मन की गति







प्श्चाताप








आंनद








Guru Gyan 7

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पश्चाताप करने वाले व्यक्ति की आत्मा पापों और अपराधों से अभिज्ञ हो जाती है और उसका विश्वास ईश्व्र के प्रति सशक्त हो जाता है।

अंतर्मन







पश्चाताप









दया भाव







Guru Gyan 6

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परोपकार कर हमें जो आत्मसंतोष और तृप्ति मिलती है , उससे हमारी सारी संपत्तियों की सार्थकता साबित होती है ।

परोपकार







आत्मज्ञान









भगवान का वास






Guru Gyan 4

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सब कार्य कराने वाला ब्रहा है , जो काम हो रहा है वह भी ब्रहा है और फिर उसका जो फल होगा , वह भी ब्रहा ही है ।

गुरु सेवा







वासना








ब्रहाभाव






Guru Gyan 3

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मैत्री असीम है क्योकि यह दूसरों पर निर्भर नहीं है, यह पूरी तरह से आपकी अपनी खिलावत है।

मैत्री







समझ








तुलना





Thursday, 17 March 2016

Guru Gyan (1)

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कोई काम सफल नही हो पाता तो हम उसे ईश्वर की मर्जी मान लेते हैं । यह कुछ नही, अपने आपसे छल और कर्म से पलायन है।


भाग्यवाद

भाग्यवाद कहीं न कहीं लोगों को अलग - अलग धर्म के खानों में बांट देता है । इसलिए कि भाग्य को ईश्वर के साथ जोड़कर देखा जाता । यहां सबके अपने - अपने ईश्वर हैं । कैसे वे दूसरे से बड़े हैं , इसके भी तर्क ढूंढ लिए जाते हैं। हम सारी जिम्मेवारी भगवान पर छोड़कर निश्चिंत हो जाते है। कि जो करना हो वही करेंगे । यहीं से निराशा का भी जन्म होने लगता है। अगर कोई काम सफल नहीं हो पाता तो हम उसे ईश्वर की मर्जी मान लेते हैं और अपने भाग्य को दोषी ठहरा देते हैं । यह और कुछ नहीं , अपने आप से छ्ल और कर्म से पलायन है।   


कर्म

कर्म तीन तरह के होते हैं। संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण । संचित वे कर्म हैं, जिनका फल अभी भोगना है। प्रारब्ध वे हैं , जो संचित कमों से ही इस जन्म में भोगने के लिए मिले हैं । क्रियमाण ऐसे कर्म हैं। जो अब हम कर रहे हैं और इंका फल भी मिलता जाता है। संचित कर्म के नाश के लिए ज्ञनयोग , प्रारब्ध कर्म के लिए भक्तियोग - क्रियमाण से कर्म ना बनें , इसके लिए कर्मयोग का रास्ता बताया गया है ।


ध्यान

ध्यान हमारी सहज अवस्था है , लेकिन हमने उसे खो दिया है ।लेकिन यह स्वर्ग पुनः पाया जा सकता है । किसी बच्चे की आंख में झांके और वहां आपको अभ्दुत मौन , निर्दोषता दिखेगी । हर बच्चा ध्यान के लिए ही पैदा होता है। लेकिन उसे समाज के रंग - ढंग सीखने ही होगें । उसे विचार करना , तर्क करना, हिसाब - किताब ,सब सीखना होगा ।उसे शब्द ,भाषा ,व्याकरण सीखना होगा और धीरे - धीरे वह अपनी निर्दोषता , सरलता से दूर हटता जाएगा  । वह समाज के ढांचे में एक कुशल यंत्र हो जाएगा। एक जीवंत , सहज मनुष्य नहीं ।